कोरबा | 11 मार्च, 2026 चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर आज जिले सहित पूरे अंचल में श्रद्धा और भक्ति के साथ शीतला अष्टमी का पर्व मनाया गया। परंपरा के अनुसार, माता शीतला को ठंडे पकवानों का भोग लगाया गया और श्रद्धालुओं ने प्रसाद के रूप में ‘बास्योड़ा’ (ठंडा भोजन) ग्रहण किया।
विधि-विधान से हुई पूजा-अर्चना
सप्तमी तिथि (10 मार्च) को घरों में ‘रांधा पुआ’ की रस्म निभाई गई, जिसमें महिलाओं ने विभिन्न प्रकार के पकवान तैयार किए। बुधवार सुबह शुभ मुहूर्त में महिलाओं ने शीतला माता के मंदिर और घरों में स्थापित प्रतिमाओं की पूजा की। माता को जल अर्पित कर रोली, अक्षत और ठंडे पकवानों का नैवेद्य चढ़ाया गया।
पूजा का शुभ समय: * तिथि प्रारंभ: 10 मार्च रात 1:54 बजे से।
पूजा मुहूर्त: सुबह 6:03 बजे से शाम 5:56 बजे तक।
रसोई को मिला विश्राम, पकवानों की रही धूम
इस विशेष पर्व पर घरों में चूल्हा नहीं जलाया गया। श्रद्धालुओं ने एक दिन पहले बने पकवानों जैसे पुआ, पूरी, कांजी बड़ा, मोहनथाल, रबड़ी, सकरपारा, गूंजी और पेठा हलुआ का आनंद लिया। मान्यता है कि इस दिन रसोई को विश्राम देने से घर में आरोग्यता और शीतलता बनी रहती है।
धार्मिक एवं स्वास्थ्य महत्व
पंडितों के अनुसार, स्कंद पुराण में शीतला माता का वर्णन मिलता है। ऐसी मान्यता है कि माता की आराधना करने से चेचक, खसरा और संक्रामक बीमारियों से रक्षा होती है।
“होली के बाद ऋतु परिवर्तन होता है और शरीर में पित्त व कफ के दोष बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे में हल्का और शीतल भोजन पाचन तंत्र को संतुलित रखने में मदद करता है।” — स्थानीय आयुर्वेदाचार्य
परंपरा और विश्वास
छत्तीसगढ़ के साथ-साथ अन्य राज्यों में इसे ‘बसौड़ा’ के नाम से भी जाना जाता है। महिलाएं अपने बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि बदलती ऋतु में संयमित जीवनशैली अपनाने का संदेश भी देता है।

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