कोरबा। इस वर्ष अक्षय तृतीया का पर्व पूरे जिले में अपार उत्साह और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। ज्योतिषीय दृष्टि से इस बार का पर्व बेहद खास रहा, क्योंकि चंद्रमा और गुरु की युति से ‘गजकेसरी योग’ का विशेष संयोग बना। इस शुभ योग के कारण बाजारों में जहां भारी रौनक दिखी, वहीं ग्रामीण और शहरी इलाकों में पारंपरिक रीति-रिवाजों की गूंज रही।
बाजारों में रही रौनक, पारंपरिक सामग्री की जमकर बिक्री
पर्व को लेकर शहर के साप्ताहिक बाजारों में सुबह से ही भीड़ उमड़ पड़ी। पूजन के लिए आवश्यक सामग्री जैसे मिट्टी के मटके, कलश, मौर और मिट्टी के गुड्डा-गुड्डी की जमकर खरीदारी हुई। गजकेसरी योग को धन और समृद्धि का प्रतीक माने जाने के कारण लोगों ने इस शुभ मुहूर्त में खरीदारी को विशेष महत्व दिया।
बच्चों ने निभाया विवाह का शगुन: चूलमाटी से लेकर मायन तक की रस्में
अक्षय तृतीया के अवसर पर कोरबा में एक बेहद खूबसूरत नजारा देखने को मिला। बच्चों ने टोलियां बनाकर घर के आंगनों में मंडप सजाए और मिट्टी के गुड्डा-गुड्डी का विवाह संपन्न कराया।
- पारंपरिक रस्में: बच्चों ने बड़ों के मार्गदर्शन में चूलमाटी, तेल और मायन जैसी सभी वैवाहिक रस्में निभाईं।
- सांस्कृतिक जुड़ाव: खेल-खेल में आयोजित यह विवाह न केवल मनोरंजन का साधन बना, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी रहा।
किसानों ने किया नई फसल का श्रीगणेश
अक्षय तृतीया का दिन अन्नदाताओं के लिए भी विशेष रहा। जिले के ग्रामीण अंचलों में किसानों ने ठाकुर देवता की विशेष पूजा-अर्चना की। परंपरा के अनुसार, दोना में धान भरकर देवता को अर्पित किया गया और फिर उसी धान को खेतों में छिड़ककर नई फसल के चक्र की शुरुआत की गई।
क्या कहते हैं ज्योतिषाचार्य?
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को ‘अक्षय’ फल देने वाली तिथि माना जाता है।
“इस वर्ष गजकेसरी योग बनने से इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ गया है। यह ‘देवलग्न’ है, जिसमें किसी भी शुभ कार्य के लिए मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। इस दिन किया गया दान और पूजन अक्षय पुण्य प्रदान करता है।”

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