कोरबा | सरकार और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की सख्त मनाही के बावजूद कोरबा जिले के ग्रामीण अंचलों में पराली (धान के अवशेष) जलाने का सिलसिला थम नहीं रहा है। ताज़ा मामला भैसमा क्षेत्र से सामने आया है, जहाँ पराली की आग ने विकराल रूप धारण कर लिया और आसपास के हरे-भरे पेड़-पौधों को अपनी चपेट में ले लिया।
हादसे की भयावहता: पेड़-पौधे खाक, बाल-बाल बची आबादी
भैसमा क्षेत्र में किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा खेत में छोड़ी गई पराली में आग लगा दी गई। हवा के झोंकों के साथ यह आग तेजी से फैली और देखते ही देखते भारी संख्या में पेड़-पौधे जलकर खाक हो गए। गनीमत यह रही कि आग रिहायशी इलाके (आबादी) तक नहीं पहुंची, वरना बड़ा हादसा हो सकता था।
मशीनीकरण बना पराली का मुख्य कारण
खेती में बढ़ते आधुनिकीकरण ने मजदूरों पर निर्भरता कम कर दी है। हार्वेस्टर और थ्रेशर जैसी मशीनों से फसल की कटाई और मिंजाई तो आसान हो गई है, लेकिन फसल कटने के बाद अवशेष (पराली) खेतों में ही छूट जाते हैं। किसान इसे साफ करने के बजाय जलाना आसान समझते हैं, जिसके गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं:
- वायु प्रदूषण: धुएं से सांस और सेहत संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं।
- मिट्टी की उर्वरता: आग से जमीन के मित्र कीट मर जाते हैं और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति घटती है।
- चारे का संकट: खेतों की घास जलने से मवेशियों के लिए चारे की भारी कमी हो रही है।
जुर्माने का है प्रावधान, फिर भी लापरवाही जारी
नियमों के मुताबिक, पराली जलाने पर रकबे के अनुसार दंड निर्धारित है:
| कृषि भूमि का रकबा | जुर्माने की राशि |
| :— | :— |
| 2 एकड़ से कम | ₹ 2,500 |
| 2 से 5 एकड़ तक | ₹ 5,000 |
| 5 एकड़ से अधिक | ₹ 15,000 |
निगरानी की जिम्मेदारी: शासन ने इसकी मॉनिटरिंग का जिम्मा कृषि, राजस्व और पंचायत विभाग को सौंपा है, लेकिन धरातल पर कार्रवाई और जागरूकता की कमी स्पष्ट दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञ की राय: जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते किसानों को जागरूक नहीं किया गया, तो पराली नष्ट करने का यह ‘शॉर्टकट’ भविष्य में बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी का कारण बनेगा।

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