कोरबा | छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में एसईसीएल (SECL) रजगामार क्षेत्र में उस वक्त हड़कंप मच गया जब वन विभाग की टीम ने घेराबंदी कर कोयला लोड चार ट्रेलर और ट्रकों को अपनी कस्टडी में ले लिया। यह कार्रवाई रजगामार बैरियर के पास की गई। मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है क्योंकि वन विभाग और SECL प्रबंधन दोनों ही जमीन पर अपना-अपना दावा ठोक रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
एसईसीएल रजगामार की बंद पड़ी 6-7 नंबर भूमिगत खदान को प्रबंधन ने प्रक्रिया पूरी कर 12 मार्च से दोबारा शुरू किया था। खदान से कोयला उत्खनन के बाद परिवहन के लिए डीओ (Delivery Order) भी जारी किया गया था। मंगलवार को जब ट्रेलर क्रमांक CG 15 AC 3411, CG 12 AS 9296, CG 04 JD 8206 और ट्रक क्रमांक CG 12 S 2604 कोयला लेकर रायगढ़, चांपा और रायपुर के लिए रवाना हुए, तभी वनमंडलाधिकारी (DFO) प्रेमलता यादव के निर्देश पर टीम ने इन्हें दबोच लिया।
विवाद की जड़: लीज बनाम पीएफ (Protected Forest) भूमि
इस मामले में मुख्य विवाद जमीन के मालिकाना हक को लेकर है:
- SECL का दावा: प्रबंधन का कहना है कि जिस क्षेत्र में उत्खनन हो रहा है, वह उनकी लीज की जमीन है।
- वन विभाग का दावा: विभाग के रिकॉर्ड में यह जमीन पीएफ (Protected Forest) के रूप में दर्ज है। नियमानुसार, वन भूमि पर उत्खनन के लिए वन विभाग से अनुमति और निश्चित शुल्क जमा कर टीपी (Transit Pass) जारी कराना अनिवार्य है।
देर रात तक चली जद्दोजहद
कार्रवाई के बाद SECL प्रबंधन और वन विभाग के बीच घंटों खींचतान चलती रही। अंततः वन विभाग ने चारों वाहनों को जब्त कर कोसाबाड़ी स्थित डिपो में खड़ा कर दिया है। वन विभाग का कहना है कि बिना टीपी के परिवहन से राजस्व की बड़ी क्षति हो रही है।
जांच के लिए पहुंची स्पेशल टीम
बुधवार को मामले की गंभीरता को देखते हुए उपवनमंडलाधिकारी (उत्तर) आर.एस. राठिया और उपवनमंडलाधिकारी (दक्षिण) सूर्यकांत सोनी के नेतृत्व में टीम ने प्रभावित क्षेत्र का मौका मुआयना किया। प्राथमिक निरीक्षण में जमीन वन विभाग की होने की पुष्टि हुई है। हालांकि, स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करने के लिए अब राजस्व विभाग की मदद लेने की भी तैयारी है।
“वन भूमि पर किसी भी प्रकार के उत्खनन के लिए अनुमति अनिवार्य है। बिना टीपी के कोयला परिवहन करना अवैध है। मामले की विस्तृत जांच की जा रही है।” — वन विभाग सूत्र

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