कोरबा | 15 अप्रैल 2026 कोरबा के बहुचर्चित वर्ष 2009 के ‘बालको चिमनी कांड’ में एक नया और सनसनीखेज मोड़ आया है। पुलिस ने आरोपी पक्ष द्वारा गवाहों को प्रभावित करने और उन्हें छिपाकर रखने के एक बड़े षड्यंत्र का पर्दाफाश किया है।
क्या है पूरा मामला?
विदित हो कि वर्ष 2009 में बालको प्लांट में निर्माणाधीन चिमनी ध्वस्त होने से 40 मजदूरों की मौत हो गई थी। यह मामला वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है। लंबे समय से गवाहों के पेशी पर न आने के कारण कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसी बीच, मुख्य आरोपी चीनी कंपनी ‘सेपको’ के नागरिकों ने हाईकोर्ट बिलासपुर में जल्द सुनवाई की याचिका दायर की थी, जिस पर समय सीमा के भीतर सुनवाई का आदेश दिया गया था।
होटल ग्रेंड गोविंदा में पुलिस की दबिश
पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ तिवारी के निर्देश और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक लखन पटले के मार्गदर्शन में बालको थाना प्रभारी युवराज तिवारी की टीम लगातार गवाहों की तलाश कर रही थी।
आज पुलिस को सूचना मिली कि प्रकरण का महत्वपूर्ण गवाह पृथ्वीनाथ सिंह (निवासी: सारण, छपरा, बिहार), जिसे पुलिस कोर्ट में पेश करना चाहती थी, उसे आरोपी पक्ष ने अपने कब्जे में ले रखा है। पुलिस ने शहर के कई होटलों में छापेमारी की, जिसके बाद होटल ग्रेंड गोविंदा के कमरा नंबर 202 में गवाह पृथ्वीनाथ सिंह अपने पुत्र और NSGL कंपनी के पूर्व कर्मचारी व आरोपी सगामसेट्टी व्येंकतेश के साथ पाया गया।
व्हाट्सएप चैट और दस्तावेजों से खुलासा
जांच में सामने आया कि:
- होटल का कमरा NSGL कंपनी द्वारा बुक कराया गया था।
- आरोपी व्येंकतेश के मोबाइल की जांच करने पर पाया गया कि वह गवाह से पहले से संपर्क में था।
- गवाह द्वारा पूर्व में दिए गए बयानों की फोटो व्हाट्सएप के माध्यम से गवाह के पुत्र को भेजी गई थी ताकि उसे सिखाया-पढ़ाया जा सके।
पुलिस ने मौके पर पंचनामा तैयार कर और फोटोग्राफ्स लेकर माननीय न्यायालय को इस साजिश से अवगत कराया। लोक अभियोजक ने गवाह को प्रभावित करने के प्रयासों पर कड़ी आपत्ति दर्ज की, जिसके बाद कोर्ट ने साक्ष्य हेतु अभियोजन को अतिरिक्त समय प्रदान किया।
विशेष बॉक्स: शक्ति जिला वेदांता हादसे ने ताजा की यादें
हाल ही में जिला शक्ति स्थित वेदांता प्लांट में हुए भीषण हादसे ने एक बार फिर सुरक्षा मानकों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, इस हादसे में 12 से 20 श्रमिकों की मौत हुई है और लगभग 40 घायल हैं। विपक्ष ने इसे मेंटेनेंस की कमी बताया है। शासन ने उच्च स्तरीय जांच के आदेश तो दिए हैं, लेकिन स्थानीय लोगों में यह डर है कि कहीं इस मामले में भी बालको कांड की तरह न्याय मिलने में दशकों का समय न लग जाए।

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