प्रबंधन के बैकफुट पर आने के बाद आंदोलन स्थगित; एक सप्ताह के भीतर चर्चा का मिला लिखित आश्वासन।
स्थानीय बेरोजगारों की उपेक्षा और बाहरी लोगों को तरजीह देने का लगाया आरोप।
कोरबा | एसईसीएल (SECL) कुसमुंडा क्षेत्र के प्रभावित गांवों के ग्रामीणों का धैर्य बुधवार को जवाब दे गया। खदान प्रभावित गांवों के बेरोजगारों को रोजगार देने और ठेका श्रमिकों को निर्धारित एचपीसी (HPC) दर पर मजदूरी भुगतान करने की मांग को लेकर सैकड़ों ग्रामीणों ने जीएम कार्यालय के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। ग्रामीणों के उग्र तेवर को देखते हुए प्रबंधन को झुकना पड़ा और एक सप्ताह के भीतर मांगों पर सकारात्मक चर्चा करने का आश्वासन दिया, जिसके बाद आंदोलन को स्थगित किया गया।
20 गांवों का अधिग्रहण, फिर भी स्थानीय युवा बेरोजगार
प्रभावित ग्रामों के प्रतिनिधि मुनीराम सोनपुरी, बृजमोहन जटराज, योगेश पाली, सुदामा पडनिया और रमेश दीवान (गेवरा) के नेतृत्व में प्रबंधन को एक ज्ञापन सौंपा गया। ज्ञापन में साफ तौर पर कहा गया है कि कुसमुंडा एरिया के उत्खनन के लिए अब तक लगभग 20 गांवों का अधिग्रहण किया जा चुका है और भविष्य में क्षमता विस्तार के लिए अन्य गांवों को भी अधिग्रहित किया जाना तय है।
इसके बावजूद, अपनी जमीन खो चुके प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीण और युवा खदान के भीतर काम करने वाली आउटसोर्सिंग कंपनियों में वैकल्पिक रोजगार के लिए तरस रहे हैं।
“कंपनियों में अन्य राज्यों और बाहरी जिलों के लोगों को धड़ल्ले से काम पर रखा जा रहा है, जबकि स्थानीय भूमि विस्थापित बेरोजगार भटकने को मजबूर हैं।”– आंदोलनकारी ग्रामीण
मजदूरों के हक पर डाका: HPC दर से कम भुगतान का आरोप
ग्रामीणों ने आउटसोर्सिंग कंपनियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि खदानों में कार्यरत ड्राइवर, सुपरवाइजर, हेल्पर और मजदूरों का आर्थिक शोषण किया जा रहा है। उन्हें सरकार और प्रबंधन द्वारा निर्धारित उच्च अधिकार प्राप्त समिति (HPC) की दर से काफी कम मजदूरी का भुगतान किया जा रहा है।
इसी शोषण और वादाखिलाफी के खिलाफ ग्रामीणों ने पहले ही बुधवार को आंदोलन करने की चेतावनी दी थी।
सुबह से ही डटे रहे ग्रामीण, आश्वासन के बाद शांत हुआ मामला
अपनी पूर्व चेतावनी के मुताबिक, बुधवार सुबह से ही प्रभावित गांवों के ग्रामीण भारी संख्या में कुसमुंडा जीएम कार्यालय के बाहर जुटने शुरू हो गए थे। ग्रामीणों ने कार्यालय के मुख्य द्वार पर जमकर नारेबाजी की और प्रदर्शन किया।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एरिया स्टाफ अधिकारी (मानव संसाधन) ने ग्रामीणों से मुलाकात की और सौंपे गए ज्ञापन पर संज्ञान लेते हुए एक सप्ताह के भीतर आधिकारिक चर्चा करने का लिखित/मौखिक आश्वासन दिया। प्रबंधन के इस ठोस आश्वासन के बाद ग्रामीणों ने फिलहाल अपना आंदोलन स्थगित करने का फैसला लिया।
प्रमुख बिंदु
- अधिग्रहण का दंश: 20 गांवों की जमीन लेने के बाद भी रोजगार का संकट।
- बाहरी बनाम स्थानीय: बाहरी राज्यों के लोगों को काम देने पर ग्रामीणों में भारी आक्रोश।
- आर्थिक शोषण: ड्राइवर, हेल्पर और मजदूरों को नहीं मिल रही निर्धारित एचपीसी दर।
- डेडलाइन: प्रबंधन के पास मांगों को सुलझाने के लिए सिर्फ 7 दिनों का समय।

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