कोरबा | जिले में इन दिनों स्कूल और कॉलेजों की परीक्षाएं पूरे उफान पर हैं। छात्र-छात्राएं अपने सुनहरे भविष्य की इबारत लिखने के लिए दिन-रात एक कर मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उनकी इस तपस्या में ‘शोर’ सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरा है। शहर और ग्रामीण इलाकों में नियमों को ताक पर रखकर बज रहे लाउडस्पीकर और डीजे ने विद्यार्थियों की नींद और एकाग्रता दोनों उड़ा दी है।
नियमों की अनदेखी, प्रशासन की ‘कोताही’
कोलाहल (ध्वनि प्रदूषण) अधिनियम के स्पष्ट निर्देश हैं कि एक निश्चित समय के बाद और निर्धारित डेसिबल से अधिक आवाज में ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग वर्जित है। बावजूद इसके, कोरबा के कई मोहल्लों में देर रात तक धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के नाम पर तेज आवाज में गाने और उद्घोषणाएं जारी हैं। अभिभावकों का आरोप है कि प्रशासन इस मामले में ढुलमुल रवैया अपना रहा है, जिससे हुड़दंगियों के हौसले बुलंद हैं।
एकाग्रता भंग, बढ़ रहा मानसिक तनाव
शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि परीक्षा के समय शांत वातावरण अनिवार्य है।
- मानसिक तनाव: लगातार शोर से छात्रों में चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ रहा है।
- एकाग्रता की कमी: तेज आवाज के कारण छात्र कठिन विषयों पर फोकस नहीं कर पा रहे हैं।
- नींद में खलल: रात 10 बजे के बाद भी बजते डीजे छात्रों की पर्याप्त नींद में बाधा डाल रहे हैं, जिसका सीधा असर उनके परीक्षा परिणाम पर पड़ सकता है।
“रात 10 बजे के बाद भी डीजे बंद नहीं होते। शिकायत करने पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखती। हमारे बच्चों का साल खराब हो रहा है।” > — एक चिंतित अभिभावक
स्थानीय निवासियों की मांग
शहरवासियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि:
- परीक्षा अवधि तक ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर पूर्ण प्रतिबंध या सख्त निगरानी रखी जाए।
- नियमों का उल्लंघन करने वाले आयोजकों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई और भारी जुर्माना लगाया जाए।
- आयोजकों से अपील की जाए कि वे सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए शोर को नियंत्रित रखें।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागकर इन नौनिहालों के भविष्य के लिए क्या कदम उठाता है।

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